मशालों की रोशनी में गूंजा झूला पुल का मुद्दा, रसूलपुर में आंदोलन ने पकड़ा नया तेवर

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दसवें दिन धरने के बाद गांधी चौक से मीठी बेरी तिराहे तक निकला मशाल जुलूस,…

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दसवें दिन धरने के बाद गांधी चौक से मीठी बेरी तिराहे तक निकला मशाल जुलूस, महिलाओं, युवाओं समेत बड़ी संख्या में लोग हुए शामिल

सूर्या संदेश

श्यामपुर/लालढांग। दस दिन से सुलग रही मांग सोमवार शाम मशालों की लौ के साथ सड़कों पर उतर आई। अंधेरा गहराने लगा तो हाथों में उठी मशालों ने आंदोलन की आवाज को और बुलंद कर दिया। गांधी चौक लालढांग से मीठी बेरी तिराहे तक निकले मशाल जुलूस में महिलाओं, पुरुषों और युवाओं की भीड़ उमड़ी तो सड़क पर हर कदम झूला पुल की मांग की आवाज बन गया। प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी करते हुए सरकार से झूला पुल का शीघ्र निर्माण कराने की मांग की।

दस दिन से धरने पर बैठे आंदोलनकारियों ने मशाल जुलूस के जरिए यह भी संदेश दिया कि वर्षों पुरानी मांग अब केवल धरने तक सीमित नहीं है।


गांधी चौक लालढांग पर मशाल जुलूस शुरू होने से पहले ग्राम प्रधान रसूलपुर मीठी बेरी कमलेश द्विवेदी ने कहा कि सरकार ने अब तक क्षेत्र की इस परेशानी पर ध्यान नहीं दिया है। पुल नहीं होने से लोगों को रोज परेशानी और खतरे के बीच आना-जाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण वर्षों से अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से झूला पुल बनवाने की मांग करते आ रहे हैं। अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि एक समय हम लोगों को लालढांग पढ़ने जाने के लिए रवासन नदी पार करनी पड़ती थी। नदी पार करते समय कपड़े भीग जाते थे और भीगे कपड़ों में ही स्कूल में पढ़ाई करनी पड़ती थी। शाम को लौटते समय फिर कपड़े भीग जाते थे और पूरा दिन इसी परेशानी में बीतता था।

उन्होंने कहा कि दुनिया बदल रही है, लेकिन उनका क्षेत्र आज भी उन्हीं समस्याओं से घिरा है। कमलेश द्विवेदी ने रवासन नदी में डूबे एक व्यक्ति का अभी तक पता नहीं चल पाने और इसके बाद आर्यन के नदी में डूबने की घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि यहां के लोग हर पल खतरे के साये में रहते हैं। रवासन नदी के कारण कब किस परिवार पर कौन-सी आफत आ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।


वक्त बदला, दुनिया बदली, मगर रवासन के इस पार बसे लोगों की परेशानी नहीं बदली। जब-जब रवासन नदी में पानी का सैलाब आता है, लोग चैन की नींद सोने के बजाय अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर रतजगा करते हैं। सैलाब का पानी उतर जाता है, मगर डर देर तक नहीं उतरता। रात की नीरवता में नदी की हर आहट यहां बसे परिवारों के लिए चिंता की दस्तक बन जाती है।


दस दिन से चल रहे धरने के बीच निकाला गया मशाल जुलूस आंदोलन की तपिश को और मुखर करता नजर आया। अंधेरे के बीच जलती मशालों की कतार और गूंजते नारों ने झूला पुल की मांग को फिर पुरजोर ढंग से सामने रखा। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से वर्षों पुरानी मांग पर जल्द कदम उठाने और झूला पुल का निर्माण कराने की मांग की।


मशाल जुलूस में महिलाओं, पुरुषों और युवाओं की बड़ी भागीदारी रही। इनमें जिला पंचायत सदस्य बृजमोहन पोखरियाल, ग्राम प्रधान रसूलपुर मीठी बेरी कमलेश द्विवेदी, पंकज चमोली, सुलोचना देवी, पुष्पा देवी और गुड्डी देवी समेत बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी शामिल रहे। मशालों की रोशनी में कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ते ग्रामीणों में झूला पुल के शीघ्र निर्माण की मांग और इसे पूरा कराने का साझा संकल्प साफ झलक रहा था।

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