रसूलपुर के झूला पुल पर सत्ता-विपक्ष एकमत, बनाएगा कौन?

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विधायक का नदी में सांकेतिक धरना, जिला पंचायत सदस्य ने डीएम को दिया ज्ञापन

सूर्या संदेश समाचार
  श्यामपुर/लालढांग। झूला पुल की मांग पर आवाजें तो दो दिशाओं से उठ रही हैं, लेकिन मंजिल एक ही है। बुधवार को सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने पुल निर्माण के लिए अपने-अपने स्तर से कदम बढ़ाए। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—मांग दोनों की है, लेकिन रवासन नदी पर झूला पुल बनाएगा कौन?


रसूलपुर में रवासन नदी पर झूला पुल की मांग लंबे समय से उठती रही है। बुधवार को इस मुद्दे पर एक ही दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधियों की सक्रियता सामने आई।


हरिद्वार ग्रामीण की विधायक अनुपमा रावत ने समर्थकों के साथ रवासन नदी में खड़े होकर सांकेतिक धरना दिया। उन्होंने 10 दिन के भीतर झूला पुल निर्माण के संबंध में शासनादेश जारी करने की मांग की। शासनादेश जारी नहीं होने पर आमरण अनशन की चेतावनी भी दी।

झूला पुल निर्माण की मांग को लेकर समर्थकों के साथ प्रदर्शन करती हरिद्वार ग्रामीण विधायक अनुपमा रावत


इसी दिन जिला पंचायत सदस्य बृजमोहन पोखरियाल ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने तीन दिन के भीतर झूला पुल निर्माण की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने की मांग की। ऐसा नहीं होने पर धरना-प्रदर्शन करने की बात कही।

झूला पुल निर्माण के लिए जिलाधिकारी मयूर दीक्षित को मांग पत्र सौंपते जिला पंचायत सदस्य बृजमोहन पोखरियाल


एक ही दिन सामने आई दोनों पहलों में मुद्दा और मांग एक है, लेकिन रास्ता अलग-अलग है। एक ओर विपक्ष की विधायक ने धरने के जरिए सरकार का ध्यान खींचा, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष से जुड़े जिला पंचायत सदस्य ने प्रशासन के समक्ष ज्ञापन के माध्यम से पुल निर्माण की पैरवी की।


यहीं से ग्रामीणों के बीच एक स्वाभाविक सवाल भी खड़ा होता है। जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों झूला पुल निर्माण के पक्ष में हैं, तो फिर निर्माण की दिशा में अंतिम निर्णय और कार्रवाई किस स्तर से होगी?


वर्षों से पुल की जरूरत महसूस कर रहे ग्रामीणों के लिए धरना और ज्ञापन अपने आप में समाधान नहीं हैं। उनकी नजर अब इस बात पर है कि इन पहलों के बाद शासन-प्रशासन की ओर से वास्तव में क्या कदम उठाया जाता है।


इस बीच क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि जनप्रतिनिधियों की सक्रियता ग्रामीणों की पुरानी समस्या के समाधान की कोशिश है या इसके साथ आगामी चुनाव की राजनीतिक सक्रियता का पहलू भी जुड़ा है। इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी दावे से नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में होने वाली ठोस कार्रवाई से ही मिलेगा।


बुधवार को दोनों पक्ष अपनी-अपनी भूमिका निभा चुके हैं। अब जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है, जिसके स्तर से पुल निर्माण को लेकर निर्णय और काम आगे बढ़ना है।
ग्रामीणों का सवाल इसलिए अब और सीधा हो गया है—मांग दोनों की है, तो रवासन नदी पर झूला पुल बनाएगा कौन?

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