जंगल की जिंदगी,पुनर्वास की उम्मीद में वन गुर्जर समाज, वर्षों बाद भी नहीं बदली जमीनी तस्वीर
श्यामपुर। जंगल की पगडंडियों से बाहर एक सुरक्षित और स्थायी ठिकाने की उम्मीद वन गुर्जर परिवारों के लिए आज भी अधूरी है।
वर्षों से जंगल को अपना घर मानकर रह रहे परिवारों की जिंदगी में सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि उन्हें कब ऐसी जगह मिलेगी, जहां परिवार सुरक्षित जीवन जी सकें और बच्चों का भविष्य भी बेहतर हो सके। पुनर्वास को लेकर लंबे समय से चल रही कवायद के बावजूद जमीनी तस्वीर में अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है।
राजाजी नेशनल पार्क के जंगलों में जीवन आसान नहीं है। मवेशियों पर निर्भर परिवारों के सामने वन्यजीवों का खतरा बना रहता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच भी सामान्य आबादी की तुलना में सीमित है।
जंगल का जीवन उनके लिए परंपरा से अधिक अब एक मजबूरी बनता जा रहा है। ऐसे में पुनर्वास उनके लिए केवल जमीन या मकान मिलने का विषय नहीं, बल्कि सुरक्षित जीवन और बेहतर भविष्य से जुड़ा सवाल है।
वन गुर्जर समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि पुनर्वास को लेकर समय-समय पर प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद जरूर बनी, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान अब तक सामने नहीं आया। उनका कहना है कि परिवारों की परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं।
बच्चे बड़े हो रहे हैं, परिवारों का विस्तार हो रहा है और नई पीढ़ी भी उसी अनिश्चितता के बीच अपना भविष्य तलाश रही है। ऐसे में वर्षों पुरानी प्रक्रिया के बजाय वर्तमान स्थिति को समझकर आगे की कार्रवाई किए जाने की जरूरत है।
समाज से जुड़े लोगों के मुताबिक चंडी रेंज सहित जंगल के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले कई परिवार अभी भी ऐसी प्रक्रिया का इंतजार कर रहे हैं, जिसके जरिए उनकी स्थिति स्पष्ट हो और उन्हें पुनर्वास के दायरे में लाया जा सके। उनका कहना है कि सभी प्रभावित परिवारों की मौजूदा स्थिति सामने आए बिना पुनर्वास की तस्वीर भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकती।
वन गुर्जर एवं पुनर्वास समिति के अध्यक्ष शमशाद अली का कहना है कि समाज लंबे समय से पुनर्वास की मांग उठाता रहा है। परिवारों की ओर से अपनी समस्याएं संबंधित स्तर तक पहुंचाई जाती रही हैं, लेकिन इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है।
वन गुर्जर समुदाय से जुड़े पूर्व प्रधान शमशेर अली भड़ाना और सफी लोधा का कहना है कि अब इस विषय को केवल पुराने आश्वासनों और प्रक्रियाओं तक सीमित रखने के बजाय वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर देखा जाना चाहिए। जंगल में रहने वाले परिवारों की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पुनर्वास की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है।
इसी बीच समाज के कुछ लोगों की ओर से यह बात भी सामने आती रही है कि पुनर्वास से संबंधित मामला न्यायालय में विचाराधीन है। हालांकि, इसकी न्यायिक स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के स्तर पर नहीं हो सकी है। ऐसे में इस संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय संबंधित पक्षों और आधिकारिक स्तर से स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
वन गुर्जरों का यह मुद्दा केवल किसी एक समुदाय को जंगल से बाहर बसाने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में परिवारों की सुरक्षा, बच्चों की शिक्षा, आजीविका, बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच और आने वाली पीढ़ी का भविष्य है। वर्षों से चली आ रही समस्या के बीच अब जरूरत ऐसी पहल की है, जो कागजी प्रक्रिया से आगे बढ़कर जंगल में रहने वाले परिवारों की जिंदगी में दिखाई दे।
आखिर सुरक्षित जीवन की उम्मीद लगाए इन परिवारों को और कितना इंतजार करना होगा? जंगल की पगडंडियों से निकलकर पक्के और सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचने का रास्ता कब खुलेगा? यह सवाल अब केवल वन गुर्जर समाज का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से भी है जो वर्षों से चल रही पुनर्वास की कवायद को उसके अंतिम पड़ाव तक पहुंचाने का इंतजार कर रही है।

